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जीवन में सुख

सुलैमान अपने ज्ञान, शानदार महल और कई प्रेमियों के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन क्या वह संतुष्ट था? 18 9 0 द्वारा पेंटिंग Edward Poynter

सुलैमान, एक प्राचीन राजा अपने ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है, जिसने लगभग 950 ईसा पूर्व में कई ऐसी कविताओं को लिखा जो बाइबल के पुराने नियम का भाग हैं। जीवन की सन्तुष्टि प्राप्त करने के लिए जो कुछ उसने किया उन्हें वह सभोपदेशक  नामक पुस्तक में वर्णन करता है। वह लिखता है (पूरे पूरी पुस्तक के लिए लिंक यहाँ है):

“मैंने अपने मन से कहा, ‘चल, मैं तुझ को आनन्द के द्वारा जाँचूँगा।’…मैंने मन में सोचा कि किस प्रकार से मेरी बुद्धि बनी रहे और मैं अपने प्राण को दाखमधु पीने से किस प्रकार बहलाऊँ और – कैसे मूर्खता को थामे रहूँ, जब तक मालूम न करूँ कि वह अच्छा काम कौन सा है जिसे मनुष्य जीवन भर करता रहे।

मैंने बड़े बड़े काम किए; मैंने अपने लिये घर बनवा लिए और अपने लिये दाख की बारियाँ लगवाईं; मैंने अपने लिये बारियाँ और बाग लगवा लिए, और उनमें भाँति भाँति के फलदाई वृक्ष लगाए। मैंने अपने लिये कुण्ड खुदवा लिए कि उनसे वह वन सींचा जाए जिसमें पौधे लगाए जाते थे। मैंने दास और दासियाँ मोल लीं, और मेरे घर में दास भी उत्पन्न हुए; और जितने मुझसे पहिले यरूशलेम में थे उसने कहीं अधिक गाय-बैल और भेड़- बकरियों का मैं स्वामी था।

मैंने चाँदी और सोना और राजाओं और प्रान्तों के बहुमूल्य पदार्थों का भी संग्रह किया; मैंने अपने लिये गायकों और गायिकाओं को रखा, और बहुत सी कामिनियाँ भी –जिनसे मनुष्य सुख पाते हैं, अपनी कर लीं। इस प्रकार मैं अपने से पहले के सब यरूशलेमवासियों से अधिक महान और धनाढ्य हो गया… और जितनी वस्तुओं के देखने की मैंने लालसा की, उन सभों को देखने से मैं न रूका; मैंने अपना मन किसी प्रकार का आनन्द भोगने से न रोका क्योंकि मेरा मन मेरे सब परिश्रम के कारण आनन्दित हुआ; और मेरे सब परिश्रम से मुझे यही भाग मिला।” (सभोपदेशक 2:1-10)

धन, प्रसिद्धि, बुद्धि, बड़े बड़े काम, स्त्रियाँ, आमोद-प्रमोद, राज्य, जीविका के लिए तरक्की, दाखमधु इत्यादि…सुलैमान ने इन सब को पा लिया – और इन्हें किसी भी अन्य व्यक्ति से अपने और हमारे दिनों से अधिकाई से पाया। आइंस्टीन की कुशाग्र बुद्धि, लक्ष्मी मित्तल, अम्बानी बन्धुओं या रतन टाटा का धन, बालीवुड हीरो सलमान खान का सामाजिक/यौन सम्बन्धी जीवन, राजकीय वंशावली से सम्बन्धित होने का गुण, ठीक वैसे ही जैसा कि ब्रिटेन के राजकीय परिवार में राजकुमार विलियम के साथ है – यह सब कुछ एक साथ मिलकर उसमें पाए जाते थे। इस संयोजन को कौन पराजित कर सकता है? आप सोचते होंगे कि वह तो सभी लोगों में से अकेला ही सन्तुष्टि को पा गया होगा।

उसके द्वारा लिखी हुई कविताओं के एक संग्रह, श्रेष्ठगीत  में, जो बाइबल में ही पाया जाता है, वह उसके द्वारा किए जा रहे कामुक, गर्माहट भरे-प्रेम सम्बन्ध को वर्णित करता है – ऐसा प्रसंग जो अपनी संभावना में जीवन-पर्यन्त सन्तुष्टि को सबसे अधिक प्रदान करने के लिए जान पड़ता है। पूर्ण कविता यहाँ नीचे दी गई है। परन्तु यहाँ पर उस कविता का वही भाग दिया गया है जिसमें उसके और उसकी प्रेमिका के मध्य में प्रेम की होती हुई अदला-बदली दी हुई है।

वर

9हे मेरी प्रिय,मैंने तेरी तुलना

फिरौन के रथों में जुती हुई घोड़ी से की है।

10तेरे गाल केशों के लटों के बीच क्या ही

सुन्दर हैं,

और तेरा कण्ठ हीरों की लड़ों के बीच।

11हम तेरे लिये चाँदी के फूलदार सोने के

आभूषण बनाएंगे।

वधू

12जब राजा अपनी मेज के पास बैठा था

मेरी जटामासी की सुगन्ध फैल रही थी।

13मेरा प्रेमी मेरे लिये लोबान की थैली के

समान है

जो मेरी छातियों के बीच में पड़ी रहती है।।

14मेरा प्रेमी मेरे लिये मेंहदी के फूलों के गुच्छे के समान है,

जो एनगदी की दाख की बारियों में होता है।।

 वर

15तू सुन्दरी है, हे मेरी प्रिय, तू सुन्दरी है!

तेरी आँखें कबूतरी की सी हैं।

 वधू

16हे मेरी प्रिय तू सुन्दर और मनभावनी है!

और हमारा बिछौना भी हरा है;

वर

17हमारे घर के धरन देवदार हैं

और हमारी छत की कड़ियाँ सनौवर हैं।।

वधू

3जैसे सेब का वृक्ष जंगल के वृक्षों के बीच में,

वैसे ही मेरा प्रेमी जवानों के बीच में है।

मैं उसकी छाया में हर्षित होकर बैठ गई,

और उसका फल मुझे खाने में मीठा लगा।

4वह मुझे भोज के घर में ले आया,

और उसका जो झण्डा मेरे ऊपर फहराता

था वह प्रेम था।

5मुझे किशमिश खिलाकर संभालो,

सेब खिलाकर बल दो;

क्योंकि मैं प्रेम में रोगी हूँ।

6काश, उसका बायाँ हाथ मेरे सिर के नीचे होता,

और अपने दहिने हाथ से वह मेरा आलिंगन करता!

7हे यरूशलेम की पुत्रियो, मैं तुमसे

चिकारियों और मैदान की हरिणियों की

शपथ धराकर कहती हूँ,

कि जब तक प्रेम आप से न उठे,

तब तक उसको न उसकाओ न जगाओ।।(श्रेष्ठगीत 1:9-2:7)

लगभग 3000 वर्ष पुरानी, इस कविता में बालीवुड की सर्वोत्तम प्रेम सम्बन्धी फिल्मों का तीव्र रोमांस मिलता है। वास्तव में बाइबल यह वर्णित करती है कि उनसे अपने अपार धन से अपने लिए 700 पटरानियों को प्राप्त कर लिया! यह बालीवुड या हालीवुड के सबसे सफल प्रेमियों में से किसी से भी कहीं अधिक है। इसलिए आप सोचते होंगे कि इस सभी तरह के प्रेम को पाकर वह सन्तुष्ट हो गया होगा। परन्तु फिर भी इन सभी तरह के प्रेम के, सभी तरह के धन के, सभी तरह की प्रसिद्धि के और ज्ञान के होने पर भी – वह यह निष्कर्ष निकालता है:

“उपदेशक का यह वचन है कि,‘व्यर्थ ही व्यर्थ, व्यर्थ ही व्यर्थ! सब कुछ व्यर्थ है’… मैंने अपना मन लगाया कि जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है, उसका भेद बुद्धि से सोच सोच कर मालूम करूँ; यह बड़े दु:ख का काम है जो परमेश्वर ने मनुष्यों के लिये ठहराया है कि वे उसमें लगें। मैंने उन सब कामों को देखा जो सूर्य के नीचे किए जाते हैं; देखो वे सब व्यर्थ और मानो वायु को पकड़ना है।” (सभोपदेशक 1:1-14)

“…तब मैंने फिर से अपने हाथों के सब कामों को, और अपने सब परिश्रम को देखा, तो क्या देखा कि सब कुछ व्यर्थ और वायु को पकड़ना है, और संसार में कोई लाभ नहीं… तब मैं अपने मन में उस सारे परिश्रम के विषय जो मैंने धरती पर किया था निराश हुआ…  यह भी व्यर्थ और बहुत ही बुरा है। मनुष्य जो धरती पर मन लगा लगा कर परिश्रम करता है उससे उसको क्या लाभ होता है?…यह भी व्यर्थ ही है।” (सभोपदेशक 2:11-23)

उसके द्वारा दर्शाये हुआ आमोद-प्रमोद, धन, कार्य, तरक्की, रोमांटिक प्रेम की प्रतिज्ञा अन्त में सन्तुष्टि प्रदान करती है, एक छलावा मात्र था। परन्तु ठीक यही वह सन्देश है जिसे आज आप और मैं सुनते हैं कि यही सन्तुष्टि का निश्चित मार्ग है। सुलैमान की कविता ने हमें पहले से ही बता दिया है कि वह इन तरीकों के माध्यम से सन्तुष्टि को प्राप्त नहीं कर सका था।

सुलैमान अपनी कविता में जीवन की तरह मृत्यु के विषय के ऊपर भी चिन्तन प्रगट करता है:

क्योंकि जैसी मनुष्यों की वैसी ही पशुओं की भी दशा होती है; दोनों की वही दशा होती है, जैसे एक मरता वैसे ही दूसरा भी मरता है। सभों की स्वांस एक सी है, और मनुष्य पशु से कुछ बढ़कर नहीं; सब कुछ व्यर्थ ही है। सब एक स्थान में जाते हैं;  सब मिट्टी से बने हैं, और सब मिट्टी में फिर मिल जाते हैं। क्या मनुष्य का प्राण ऊपर की ओर चढ़ता है और पशुओं का प्राण नीचे की ओर जाकर मिट्टी में मिल जाता है? कौन जानता है?” (सभोपदेशक 3:19-21)

सब बातें सभों को एक समान होती हैं –धर्मी हो या दुष्ट, भले, शुद्ध या अशुद्ध, यज्ञ करने और न करने वाले, सभों की दशा एक ही सी होती है। जैसी भले मनुष्य की दशा, वैसी ही पापी की दशा; जैसी शपथ खानेवाले की दशा, वैसी ही उसकी जो शपथ खाने से डरता है। जो कुछ सूर्य के नीचे किया जाता है उसमें यह एक दोष है कि सब लोगों की एक सी दशा होती है; और मनुष्यों के मनों में बुराई भरी हुई है, और जब तक वे जीवित रहते हैं उनके मन में बावलापन रहता है, और उसके बाद वे मरे हुओं में जा मिलते हैं। उसको परन्तु जो सब जीवतों में है, उसे आशा है, क्योंकि जीवता कुत्ता मरे हुए सिंह से बढ़कर है। क्योंकि जीवते तो इतना जानते हैं कि वे मरेंगे, परन्तु मरे हुए कुछ भी नहीं जानते, और न उनको कुछ और बदला मिल सकता है, क्योंकि उनका स्मरण मिट गया है। (सभोपदेशक 9:2-5)

क्यों बाइबल, एक पवित्र पुस्तक, सम्पन्नता और प्रेम की प्राप्ति के बारे में कविताओं को वर्णित करती है – क्योंकि यह ठीक वे बातें हैं जिन्हें हम पवित्रता से सम्बद्ध नहीं करते हैं? हम में से अधिकांश अपेक्षा करते हैं कि पवित्र पुस्तकें जीवन यापन करने के लिए तपस्या, धर्म और नैतिक विचारधाराओं का विचार विमर्श करें। और क्यों सुलैमान बाइबल में मृत्यु के लिए इस तरह से अन्तिम और निराशावादी तरीके से लिखता है?

सुलैमान के द्वारा लिए हुए मार्ग को, जिसमें सामान्यत: संसार की सभी बातों की प्राप्ति का प्रयास किया गया है, स्वयं के लिए जीवन जीना था, जीवन अर्थ, आमोद-प्रमोद या आदर्श किसी भी वस्तु को पाने के लिए किसी भी बात को चुनना था। परन्तु इसका अन्त सुलैमान के लिए अच्छा नहीं था – सन्तुष्टि अस्थाई और छलावा भरी थी। उसकी बाइबल में दी हुई कविताएँ एक बहुत बड़ी चेतावनी के रूप में हैं –“वहाँ पर मत जाएँ – वह तुम्हें निराश कर देगा!” क्योंकि लगभग हम में से सारे उसी मार्ग पर चलने की कोशिश करेंगे जिस पर सुलैमान चला था इसलिए यदि हम उसकी सुनते हैं तो हम बुद्धिमान हैं।

सुसमाचार – सुलैमान की कविताओं का उत्तर

यीशु मसीह (यीशु सत्संग) कदाचित् बाइबल में लिखा हुआ सबसे अधिक जाना-पहचाना व्यक्ति है। उसने भी जीवन के बारे में इस कथन को कहा है। वास्तव में उसने यह कहा:

“…मैं इसलिये आया कि वे जीवन पाएँ, और बहुतायत से पाएँ” (यूहन्ना 10:10)

“हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन से दीन हूँ; और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हलका है।” (मत्ती 11:28-30)

जब यीशु यह कहते हैं कि वह सुलैमान के द्वारा अपनी कविताओं में लिखी हुई निरर्थकता और निराशा के लिए उत्तर देते हैं। तो हो सकता है, कदाचित् हो सकता है, कि यहाँ पर सुलैमान के पथ-के-अन्त के लिए एक उत्तर हो। कुल मिलाकर, सुसमाचार का शाब्दिक अर्थ ही ‘शुभ सन्देश’ है। क्या सुसमाचार वास्तव में शुभ सन्देश है? इसका उत्तर पाने के लिए हमारे पास सुसमाचार द्वारा दी हुई समझ होने की आवश्यकता है। इसी के साथ हमें एक नासमझ आलोचक हुए बिना सुसमाचार के दावों की जाँच करने – सुसमाचार के बारे में तर्किक रूप से सोचने की आवश्यकता है।

जब मैं अपनी कहानी को यहाँ पर साझा करता हूँ, तो मैंने इसके लिए इस यात्रा किया था। इस बैबसाईट पर दिए हुए लेख इसलिए हैं कि आप स्वयं अपने लिए सुसमाचार के शुभ सन्देश की खोज करें।

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